Guru Shakti

Shani Chalisa


Shani Chalisa
श्री शनि चालीसा

Shani is one of the vishnu's avatars. Shani is considered inauspicious and the bringer of bad luck. Shani is the son of Sun and Chayya. Shani is also a male deity in the Puranas, whose iconography consists of a handsome dark (black) figure carrying a sword or other weapon, and sitting on a crow. This Shani Chalisa is a very powerful prayer and it is believed that one who recites this Shani Chalisa consistently for 40 days, all the malefic doshas or effects of Lord Shani is immediately removed from his life alongwith 'Sadesati' &' Dhaiyya'.

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुःख दूर करि , कीजै नाथ निहाल ॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु , सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय , राखहु जन की लाज ॥

जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छवि छाजै ॥

परम विशाल मनोहर भाला । टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
कुण्डल श्रवन चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमके ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं शत्रु संहारा ॥
पिंगल, कृष्णो, छायानन्दन । यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःखभंजन ॥

सौरी, मन्द, शनि, दश नामा । भानु पुत्र पूरहिं सब कामा ॥
जापर प्रभु प्रसन्न हो जाहीं । राव करैं रंकहि क्षण माहीं ॥

पर्वतहू तृण होई निहारत । तृणहू को पर्वत सम करि डारत ॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हो | कैकेई की मति हरि लीन्हो ||

बन में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गई चुराई ॥
रावण की मति गई बौराई । रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥

दियो झारि करि कंचन लंका । बाज्यो बजरंग बीर का डंका ॥
लछमन विकल शक्ति के मारे| रामादल चिंतित भए सारे॥

नृप विक्रम पर दशा जो आई | चित्र मयूर हार गा खाई ||
हार नौलखा की लगि चोरी | हाथ पैर डरवायो तोरी || 

अति निन्दामय बीता जीवन | तेली सेवा लायो नृप तन ||
विनय राग दीपक महं कीन्हो | तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हो ||

हरिश्चन्द्र नृप नारी बिकानी | राजा भर्यो डोम घर पानी ||
वक्र दृष्टि जब नल पर आई | भुंजी मीन जल पैठी जाई || 

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई | जगजननी कह भस्म कराई ||
तनिक विलोकत करी कुछ रीसा | नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ||

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । अपमानित भई  द्रौपदी  नारी ॥
कौरव कुल की गति मति हारी । युद्ध महाभारत भयो भारी ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला । कूदि परयो सहसा पाताला ॥
शेष देव तब विनती किन्ही । मुख बाहर रवि को कर दीन्ही ॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना | दिग्गज, गर्दभ, मृग, अरुस्वाना ||
जम्बुक, सिंह आदि नखधारी | सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ||

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं | हय ते सुख सम्पति उपजावैं ||
गर्दभ हानि करै बहु काजा | सिंह सिद्ध कर राज समाजा || 

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै | मृग दे कष्ट प्राण संहारे ||
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी | चोरी आदि होय डर भारी || 

तैसहि चारि चरण यह नामा | स्वर्ण लौह चांदी अरु तामा ||
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं | धन जन सम्पति नष्ट करावैं ||

समता ताम्र रजत शुभकारी | स्वर्ण सदा शुभ मंगलकारी ||
जो यह शनि चरित्र नित गावै | दशा निकृष्ट न कबहुँ सतावै ||

नाथ दिखावै अद्भुत लीला | निबल करै जैहे बलशीला ||
जो पण्डित सुयोग्य  बुलवाई | विधिवत शनि ग्रह कराई ||

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत | दीप दान दै बहु सुख पावत ||
कहत 'रासुन्दर' प्रभु दासा | शनि सुमिरत सुख होत प्रकासा ||

पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हो 'विमल' तैयार |
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ||


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