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TANTROKT RATRI SUKTAM - Meaning & Lyrics


Tantrokt Ratri Suktamratri suktam
 तन्त्रोक्त रात्रिसूक्तम् 

Ratri Sukta is one of the famous hymn to Goddess Durga and is a praise of Goddess Durga. Ratri Suktam is in true essence the praise of latent energy in Narayana and in every sadhak. Ratri Suktam is used to invoke that energy and to enhance the mind powers. Ratri Suktam is also used by people having sleep disorder. Recitation of Ratri Suktam bring one's mind in tune to sleep quicker. Ratri Suktam also tune up the energy level in the body. Ratri Suktam is to be recited 2-3 times before sleeping. 

On the other side, Ratri Suktam defines the omnipresence and omnipotence of Goddess Durga, She is the energy prevading all forms of life. She is the power in mantras. She is the energy of getting success in all endeavours. She provides everything to Her sadhak. She can destroy obstacles, enemies and every negative outcome. The energy of Durga is the cause of love, harmony, happiness and prosperity. 


विश्वेश्वरी जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ।
निद्रां भगवतीं विष्णुरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ १॥

Vishveshvari Jagaddhatrim Sthitisa.Nharakarinim.H .
Nidram Bhagavatim Vishnuratula.N Tejasah Prabhuh .. 1..
जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरुप भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति हैं,
उन्हीं भगवती निद्रा देवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे.

ब्रह्मोवाच --
त्वं स्वाहा त्वं स्वधात्वं हि वषट्कारस्वरात्मिका ।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥ २॥

देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्ही स्वधा और तुम्ही वषटकार हो. स्वर भी तुम्हारे ही स्वरुप हैं

Brahmovacha 
Tvam Svaha Tvam Svadhatvam Hi Vashat.Hkarasvaratmika 
Sudha Tvamakshare Nitye Tridha Matratmika Sthita 


अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ।
त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवी जननी परा ॥ ३॥

Ardhamatra Sthita Nitya Yanuchcharya Visheshatah 
Tvameva Sa.Ndhya Savitri Tvam Devi Janani Para 

तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो. नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार – इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन मात्राओं के अतिरिक्त जो विन्दुरुपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रुप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो. देवि! तुम्ही संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो.

त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् ।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्तेच सर्वदा ॥ ४॥

Tvayaitaddharyate Vishvam TvayaitatsrIjyate Jagat
Tvayaitatpalyate Devi Tvamatsyantecha Sarvada 

देवि! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो. तुमसे ही इस जगत की सृष्टि होती है. तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में सबको अपना ग्रास बना लेती हो.

विसृष्टौ सृष्टिरूपात्वम् स्थितिरूपाच पालने ।
तथा संहतिरूपांते जगतोऽस्य जगन्मये ॥ ५॥

Visr^Ishtau Sr^Ishtirupatvam.H Sthitirupacha Palane 
Tatha Sa.Nhatirupa.Nte Jagato.Asya Jaganmaye 
जगन्मयी देवि! इस जगत की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालनकाल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो.

महाविद्या महामाया महामेधामहास्मृतिः ।
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी ॥ ६॥

Mahavidya Mahamaya Mahamedhamahasmr^Itih 
Mahamoha Cha Bhavati Mahadevi Mahasuri 
तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति, महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो.

प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥ ७॥

Prakr^Itistvam Cha Sarvasya Gunatrayavibhavini .
Kalaratrirmaharatrirmoharatrishcha Daruna .. 7..
तुम्हीं तीनो गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो. भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो.

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ऱ्हीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा ।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शांतिः क्षांतिरेवच ॥ ८॥

Tva.N Shristvamishvari Tva.N Rhistvam Buddhirbodhalakshana 
Lajja Pushtistatha Tushtistva.N Sha.Ntih Ksha.Ntirevacha 
तुम्हीं श्री, तुम्ही ईश्वरी, तुम्ही ह्री और तुम्ही बोधस्वरुपा बुद्धि हो. लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो.

खङ्गिनी शृलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ।
शंखिनी चापिनी बाणभुशुंडीपरिधायुधा ॥ ९॥

Kha~Ngini Shr^Ilini Ghora Gadini Chakrini Tatha 
Sha.Nkhini Chapini Banabhushu.Ndiparidhayudha 
तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररुपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करने वाली हो. बाण, भुशुण्डी और परिघ – ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं.

सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुंदरी ।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥ १०॥

Saumya Saumyatarasheshasaumyebhyastvatisu.Ndari 
Paraparanam Parama Tvameva Parameshvari 
तुम सौम्य और सौम्यतर हो – इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो. पर और अपर – सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्ही हो.

यच्च किंचित क्वचिद्वस्तु सदसद्धाखिलात्मिके ।
तत्त्व सर्वस्य या शक्तिः सात्वं किं स्तूयसे सदा ॥ ११॥

Yachcha Ki.Nchita Kvachidvastu Sadasaddhakhilatmike 
Tattva Sarvasya Ya Shaktih Satva.N Ki.N Stuyase Sada 
सर्वस्वरुपे देवि! कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो. ऎसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है?

यया त्वया जगस्रष्टा जगत्पात्यतियो जगत् ।
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥ १२॥

Yaya Tvaya Jagasrashta Jagatpatyatiyo Jagat.
So.Api Nidravasha.N Nitah Kastva.N Stotumiheshvarah 
जो इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है?

विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एवच ।
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान्भवेत् ॥ १३॥

Vishnuh Shariragrahanamahamishana Evacha 
Karitaste Yato.Atastva.N Kah Stotu.N Shaktimanbhavet.H 
मुझको, भगवान शंकर को तथा भगवान विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है. अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है?

सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ ॥ १४॥

Sa Tvamittham Prabhavaih Svairudarairdevi Sa.Nstuta 
Mohayaitau Duradharshavasurau Madhukaitabhau 
देवि! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो. ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इन को मोह में डाल दो | 

प्रबोधं न जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु ।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥ १५॥

Prabodham Na Jagatsvami Niyatamachyuto Laghu 
Bodhashcha Kriyatamasya Hantumetau Mahasurau 
जगदीश्वर भगवान विष्णु को शीघ्र ही जगा दो. साथ ही इनके भीतर इन दोनो महान असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो.

॥ इति रात्रिसूक्तम् ॥

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