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Durga Saptashati - Shaap Mukti Vidhi


Durga Saptashati - Shaap Mukti VidhiDurga saptashati
दुर्गा सप्‍तशती – शाप मुक्ति विधि

'दुर्गा सप्तशती' शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है।  भगवती मां दुर्गाजी की प्रसन्नता के लिए जो अनुष्ठान किये जाते हैं उनमें दुर्गा सप्तशती का अनुष्ठान विशेष कल्याणकारी माना गया है। इस अनुष्ठान को ही शक्ति साधना भी कहा जाता है। शक्ति मानव के दैनन्दिन व्यावहारिक जीवन की आपदाओं का निवारण कर ज्ञान, बल, क्रिया शक्ति आदि प्रदान कर उसकी धर्म-अर्थ काममूलक इच्छाओं को पूर्ण करती है एवं अंत में आलौकिक परमानंद का अधिकारी बनाकर उसे मोक्ष प्रदान करती है। दुर्गा सप्तशती एक तांत्रिक पुस्तक होने का गौरव भी प्राप्त करती है। 

नारद के  आग्रह पर भगवान शिव ने दुर्गा सप्‍तशती को शापमुक्‍त करने की पूरी विधि बताई और इस विधि का अनुसरण किए बिना दुर्गा सप्‍तशती के मारण, वशीकरण, उच्‍चाटन जैसे मंत्रों को सिद्ध नहीं किया जा सकता न ही दुर्गा सप्‍तशती के पाठ का ही पूरा लाभ मिलता है। भगवान शिव के अनुसार जो व्‍यक्ति मां दुर्गा के रूप मंत्रों को किसी अच्‍छे कार्य के लिए जाग्रत करना चाहता है, उसे पहले दुर्गा सप्‍तशती को शाप मुक्‍त करना होता है और दुर्गा सप्‍तशती को शापमुक्‍त करने के लिए सबसे पहले 

1. निम्‍न मंत्र का 7 बार जप करना होता है

"ऊँ ह्रीं क्‍लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्‍यै शापनाशानुग्रहं कुरू कुरू स्‍वाहा"

2. फिर इसके पश्‍चात निम्‍न मंत्र का 21 बार जप करना हाेता है-

"ऊँ श्रीं क्‍लीं ह्रीं सप्‍तशति चण्डिके उत्‍कीलनं कुरू कुरू स्‍वाहा"

3. और अंत में निम्‍न मंत्र का 21 बार जप करना हाेता है-
 
"ऊँ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विधे मृतमूत्‍थापयोत्‍थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्‍वाहा"

4. इसके बाद निम्‍न मंत्र का 108 बार जप करना होता है-

"ऊँ श्रीं श्रीं क्‍लीं हूं ऊँ ऐं क्षाेंभय मोहय उत्‍कीलय उत्‍कीलय उत्‍कीलय ठं ठं"

इतनी विधि करने के बाद मां दुर्गा का दुर्गा-सप्‍तशती ग्रंथ भगवान शिव जी के शाप से मुक्‍त हो जाता है।
इस प्रक्रिया को हम दुर्गा पाठ की कुंजी भी कह सकते हैं और जब तक इस कुंजी का उपयोग नहीं किया जाता,
तब तक दुर्गा-सप्‍तशती के पाठ का उतना फल प्राप्‍त नहीं होता, जितना होना चाहिए क्‍योंकि दुर्गा सप्‍तशती ग्रंथ को
शापमुक्‍त करने के बाद ही उसका पाठ पूर्ण फल प्रदान करता है।

जिस साधक ने योग्य गुरु से दुर्गा या चामुंडा दीक्षा  प्रापत की हो उसे इस विधि को करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती |
उसके लिए दुर्गा सप्तशती सदैव फलदायी रहती है |
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