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Sidh Kunjika Stotra Ko Kabh Aur Kaise Sidh Karen


Sidh Kunjika Stotra Ko Kabh Aur Kaise Sidh Karen sidh kunjika stotra
सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को कैसे और कब सिद्ध करें |

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र भगवती चामुंडा का एक प्रसिद्ध और  दिव्य स्तोत्र है | जो साधक जीवन में आर्थिक और आद्यात्मिक प्रगति चाहते हैं उन्हें देवी के इस पावन स्तोत्र  का अवश्य पाठ करना चाहिए | अगर साधक किसी कारणवश दुर्गा सप्तशती का पठन नहीं कर सकते उनके  लिए यह चमत्कारी स्तोत्र एक वरदान के समान है |  कुंजिका स्तोत्र जीवन के सभी शुभ द्वारो को खोलने की  गुप्त कुंजी है | 

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ किस समय किया जाना चाहिए | प्रत्येक तिथि का समय काल 24 घंटे का होता है | अगर नवमी तिथि सुबह 7:00 am बजे शुरू होती है तो  साधक को इस स्तोत्र का पाठ सुबह 6:36 am से शुरू  करना चाहिए और 7:24 am तक इस का पाठ समाप्त  करना चाहिए | यह समय संधि क्षण कहलाता है और  बहुत ही पवित्र समय है | अगर नवरात्रि में इस समय  में पाठ कर लिया जाय तो यह स्तोत्र सिद्ध हो जाता है  और साधक को देवी से वर की प्रप्ति होती है | 

कुञ्जिकास्तोत्रम् अथवा सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

श्री गणेशाय नमः ।
ॐ अस्य श्रीकुञ्जिकास्तोत्रमन्त्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीत्रिगुणात्मिका देवता, ॐ ऐं बीजं, ॐ ह्रीं शक्तिः, ॐ क्लीं कीलकम्,
मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

शिव उवाच ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ॥ १॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥ २॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥ ३॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति ।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥ ४॥

अथ मन्त्रः ।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ ५॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥ ६॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ॥ ७॥

ऐङ्कारी सृष्टिरूपायै ह्रीङ्कारी प्रतिपालिका ।
क्लीङ्कारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥ ८॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥ ९॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥ १०॥

हुं हुं हुङ्काररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥ ११॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ।
धिजाग्रम् धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥ १२॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरूष्व मे ॥ १३॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे ।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥ १४॥

यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ १५॥

। इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे
कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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