Chhinnamasta Kavach


श्रीछिन्नमस्ताकवचम् 

 

Chhinnamasta Kavacham 

Chhinnamastika is a mahavidya and is vigourous by nature though it always care for her devotees. Chhinnamastika Kavach is used to attain the abundance and richness in life. The Chhinnamasta Kavach was originally revealed by Lord Bhairava to Goddess Parvati and is an effective tool to eliminate the economic crisis of the sadhak. 

 

छिन्नमस्तिका एक महाविद्या है और स्वभाव से उग्र  है हालांकि यह हमेशा अपने भक्तों की देखभाल करती है। छिन्नमस्तिका कवच का उपयोग जीवन में प्रचुरता और समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया जाता है। छिन्नमस्ता कवच मूल रूप से देवी पार्वती को भगवान भैरव द्वारा प्रकट किया गया था और यह साधक के आर्थिक संकट को खत्म करने के लिए एक प्रभावी उपाय है।

 

The Sadhak who recites this Chhinnamasta Kavach gets the ability to destroy the group of enemies. Goddess Lakshmi always stays in his home and Goddess Saraswati stays on her tongue providing him the wisdom and divinity. Even the destructive weapons like Brahmaastra loose its power in front of the sadhak.

 

इस छिन्नमस्ता कवच का पाठ करने वाले साधक को शत्रुओं के समूह को नष्ट करने की क्षमता मिलती है। देवी लक्ष्मी हमेशा अपने घर में रहती हैं और देवी सरस्वती उनकी जीभ पर रहती हैं जो उन्हें ज्ञान और दिव्यता प्रदान करती हैं। यहां तक ​​कि ब्रह्मास्त्र जैसे विनाशकारी हथियार भी साधक की शक्ति के आगे नतमस्तक हो जाते हैं | 

 

Chhinnamasta Kavacham 


श्रीगणेशाय नमः ।
देव्युवाच ।
कथिताच्छिन्नमस्ताया या या विद्या सुगोपिताः ।
त्वया नाथेन जीवेश श्रुताश्चाधिगता मया ॥ १॥

इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं सर्वसूचितम् ।
त्रैलोक्यविजयं नाम कृपया कथ्यतां प्रभो ॥ २॥

Devyuvacha |
Kathitachchinnamastaya Ya Ya Vidya Sugopitah |
Tvaya Nathena Jivesha Shrutashchadhigata Maya || 1||
Idanim Shrotumichchami Kavacham Sarvasuchitam |
Trailokyavijayam Nama Kr^Ipaya Kathyatam Prabho || 2||

 

भैरव उवाच ।
श्रुणु वक्ष्यामि देवेशि सर्वदेवनमस्कृते ।
त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं सर्वमोहनम् ॥ ३॥

Bhairava Uvacha |
Shrunu Vakshyami Deveshi Sarvadevanamaskr^Ite |
Trailokyavijayam Nama Kavacham Sarvamohanam || 3||

 

सर्वविद्यामयं साक्षात्सुरात्सुरजयप्रदम् ।
धारणात्पठनादीशस्त्रैलोक्यविजयी विभुः ॥ ४॥

Sarvavidyamayam Sakshatsuratsurajayapradam |
Dharanatpathanadishastrailokyavijayi Vibhuh || 4||

 

ब्रह्मा नारायणो रुद्रो धारणात्पठनाद्यतः ।
कर्ता पाता च संहर्ता भुवनानां सुरेश्वरि ॥ ५॥

Brahma Narayano Rudro Dharanatpathanadyatah |
Karta Pata Cha Sa.Nharta Bhuvananam Sureshvari || 5||

 

न देयं परशिष्येभ्योऽभक्तेभ्योऽपि विशेषतः ।
देयं शिष्याय भक्ताय प्राणेभ्योऽप्यधिकाय च ॥ ६॥

Na Deyam Parashishyebhyo.Abhaktebhyo.Api Visheshatah |
Deyam Shishyaya Bhaktaya Pranebhyo.Apyadhikaya Cha || 6||

 

देव्याश्च च्छिन्नमस्तायाः कवचस्य च भैरवः ।
ऋषिस्तु स्याद्विराट् छन्दो देवता च्छिन्नमस्तका ॥ ७॥

Devyashcha Chchinnamastayah Kavachasya Cha Bhairavah |
R^Ishistu Syadvirat Chando Devata Chchinnamastaka || 7||

 

त्रैलोक्यविजये मुक्तौ विनियोगः प्रकीर्तितः ।
हुंकारो मे शिरः पातु छिन्नमस्ता बलप्रदा ॥ ८॥

Trailokyavijaye Muktau Viniyogah Prakirtitah |
Humkaro Me Shirah Patu Chinnamasta Balaprada || 8||

 

ह्रां ह्रूं ऐं त्र्यक्षरी पातु भालं वक्त्रं दिगम्बरा ।
श्रीं ह्रीं ह्रूं ऐं दृशौ पातु मुण्डं कर्त्रिधरापि सा ॥ ९॥

Hram Hrum Aim Tryakshari Patu Bhalam Vaktram Digambara |
Shrim Hrim Hrum Aim Dr^Ishau Patu Mundam Kartridharapi Sa || 9||

 

सा विद्या प्रणवाद्यन्ता श्रुतियुग्मं सदाऽवतु ।
वज्रवैरोचनीये हुं फट् स्वाहा च ध्रुवादिका ॥ १०॥

Sa Vidya Pranavadyanta Shrutiyugmam Sada.Avatu |
Vajravairochaniye Hum Phat Svaha Cha Dhruvadika || 10||

 

घ्राणं पातु च्छिन्नमस्ता मुण्डकर्त्रिविधारिणी ।
श्रीमायाकूर्चवाग्बीजैर्वज्रवैरोचनीयह्रूं ॥ ११॥

Ghranam Patu Chchinnamasta Mundakartrividharini |
Shrimayakurchavagbijairvajravairochaniyahrum || 11||

 

हूं फट् स्वाहा महाविद्या षोडशी ब्रह्मरूपिणी ।
स्वपार्श्र्वे वर्णिनी चासृग्धारां पाययती मुदा ॥ १२॥

Hum Phat Svaha Mahavidya Shodashi Brahmarupini |
Svaparshrve Varnini Chasr^Igdharam Payayati Muda || 12||

 

वदनं सर्वदा पातु च्छिन्नमस्ता स्वशक्तिका ।
मुण्डकर्त्रिधरा रक्ता साधकाभीष्टदायिनी ॥ १३॥

Vadanam Sarvada Patu Chchinnamasta Svashaktika |
Mundakartridhara Rakta Sadhakabhishtadayini || 13||

 

वर्णिनी डाकिनीयुक्ता सापि मामभितोऽवतु ।
रामाद्या पातु जिह्वां च लज्जाद्या पातु कण्ठकम् ॥ १४॥

Varnini Dakiniyukta Sapi Mamabhito.Avatu |
Ramadya Patu Jihvam Cha Lajjadya Patu Kanthakam || 14||

 

कूर्चाद्या हृदयं पातु वागाद्या स्तनयुग्मकम् ।
रमया पुटिता विद्या पार्श्वौ पातु सुरेश्र्वरी ॥ १५॥

Kurchadya Hr^Idayam Patu Vagadya Stanayugmakam |
Ramaya Putita Vidya Parshvau Patu Sureshrvari || 15||

 

मायया पुटिता पातु नाभिदेशे दिगम्बरा ।
कूर्चेण पुटिता देवी पृष्ठदेशे सदाऽवतु ॥ १६॥

Mayaya Putita Patu Nabhideshe Digambara |
Kurchena Putita Devi Pr^Ishthadeshe Sada.Avatu || 16||

 

वाग्बीजपुटिता चैषा मध्यं पातु सशक्तिका ।
ईश्वरी कूर्चवाग्बीजैर्वज्रवैरोचनीयह्रूं ॥ १७॥

Vagbijaputita Chaisha Madhyam Patu Sashaktika |
Ishvari Kurchavagbijairvajravairochaniyahrum || 17||

 

हूंफट् स्वाहा महाविद्या कोटिसूर्य्यसमप्रभा ।
छिन्नमस्ता सदा पायादुरुयुग्मं सशक्तिका ॥ १८॥

Humphat Svaha Mahavidya Kotisuryyasamaprabha |
Chinnamasta Sada Payaduruyugmam Sashaktika || 18||

 

ह्रीं ह्रूं वर्णिनी जानुं श्रीं ह्रीं च डाकिनी पदम् ।
सर्वविद्यास्थिता नित्या सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु ॥ १९॥

Hrim Hrum Varnini Janum Shrim Hrim Cha Dakini Padam |
Sarvavidyasthita Nitya Sarva~Ngam Me Sada.Avatu || 19||

 

प्राच्यां पायादेकलिङ्गा योगिनी पावकेऽवतु ।
डाकिनी दक्षिणे पातु श्रीमहाभैरवी च माम् ॥ २०॥

Prachyam Payadekali~Nga Yogini Pavake.Avatu |
Dakini Dakshine Patu Shrimahabhairavi Cha Mam || 20||

 

नैरृत्यां सततं पातु भैरवी पश्चिमेऽवतु ।
इन्द्राक्षी पातु वायव्येऽसिताङ्गी पातु चोत्तरे ॥ २१॥

Nairr^Ityam Satatam Patu Bhairavi Pashchime.Avatu |
Indrakshi Patu Vayavye.Asita~Ngi Patu Chottare || 21||

 

संहारिणी सदा पातु शिवकोणे सकर्त्रिका ।
इत्यष्टशक्तयः पान्तु दिग्विदिक्षु सकर्त्रिकाः ॥ २२॥

Sa.Nharini Sada Patu Shivakone Sakartrika |
Ityashtashaktayah Pantu Digvidikshu Sakartrikah || 22||

 

क्रीं क्रीं क्रीं पातु सा पूर्वं ह्रीं ह्रीं मां पातु पावके ।
ह्रूं ह्रूं मां दक्षिणे पातु दक्षिणे कालिकाऽवतु ॥ २३॥

Krim Krim Krim Patu Sa Purvam Hrim Hrim Mam Patu Pavake |
Hrum Hrum Mam Dakshine Patu Dakshine Kalika.Avatu || 23||

 

क्रीं क्रीं क्रीं चैव नैरृत्यां ह्रीं ह्रीं च पश्चिमेऽवतु ।
ह्रूं ह्रूं पातु मरुत्कोणे स्वाहा पातु सदोत्तरे ॥ २४॥

Krim Krim Krim Chaiva Nairr^Ityam Hrim Hrim Cha Pashchime.Avatu |
Hrum Hrum Patu Marutkone Svaha Patu Sadottare || 24||

 

महाकाली खड्गहस्ता रक्षःकोणे सदाऽवतु ।
तारो माया वधूः कूर्चं फट् कारोऽयं महामनुः ॥ २५॥

Mahakali Khadgahasta Rakshahkone Sada.Avatu |
Taro Maya Vadhuh Kurcham Phat Karo.Ayam Mahamanuh || 25||

 

खड्गकर्त्रिधरा तारा चोर्ध्वदेशं सदाऽवतु ।
ह्रीं स्त्रीं हूं फट् च पाताले मां पातु चैकजटा सती ।
तारा तु सहिता खेऽव्यान्महानीलसरस्वती ॥ २६॥

Khadgakartridhara Tara Chordhvadesham Sada.Avatu |
Hrim Strim Hum Phat Cha Patale Mam Patu Chaikajata Sati |
Tara Tu Sahita Khe.Avyanmahanilasarasvati || 26||

 

इति ते कथितं देव्याः कवचं मन्त्रविग्रहम् ।
यद्धृत्वा पठनान्भीमः क्रोधाख्यो भैरवः स्मृतः ॥ २७॥

Iti Te Kathitam Devyah Kavacham Mantravigraham |
Yaddhr^Itva Pathananbhimah Krodhakhyo Bhairavah Smr^Itah || 27||

 

सुरासुरमुनीन्द्राणां कर्ता हर्ता भवेत्स्वयम् ।
यस्याज्ञया मधुमती याति सा साधकालयम् ॥ २८॥

Surasuramunindranam Karta Harta Bhavetsvayam |
Yasyaj~Naya Madhumati Yati Sa Sadhakalayam || 28||

 

भूतिन्याद्याश्च डाकिन्यो यक्षिण्याद्याश्च खेचराः ।
आज्ञां गृह्णंति तास्तस्य कवचस्य प्रसादतः ॥ २९॥

Bhutinyadyashcha Dakinyo Yakshinyadyashcha Khecharah |
Aj~Nam Gr^Ihnamti Tastasya Kavachasya Prasadatah || 29||

 

एतदेवं परं ब्रह्मकवचं मन्मुखोदितम् ।
देवीमभ्यर्च गन्धाद्यैर्मूलेनैव पठेत्सकृत् ॥ ३०॥

Etadevam Param Brahmakavacham Manmukhoditam |
Devimabhyarcha Gandhadyairmulenaiva Pathetsakr^It || 30||

 

संवत्सरकृतायास्तु पूजायाः फलमाप्नुयात् ।
भूर्जे विलिखितं चैतद्गुटिकां काञ्चनस्थिताम् ॥ ३१॥

Sa.Nvatsarakr^Itayastu Pujayah Phalamapnuyat |
Bhurje Vilikhitam Chaitadgutikam Ka~Nchanasthitam || 31||

 

धारयेद्दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा यदि वान्यतः ।
सर्वैश्वर्ययुतो भूत्वा त्रैलोक्यं वशमानयेत् ॥ ३२॥

Dharayeddakshine Bahau Kanthe Va Yadi Vanyatah |
Sarvaishvaryayuto Bhutva Trailokyam Vashamanayet || 32||

 

तस्य गेहे वसेल्लक्ष्मीर्वाणी च वदनाम्बुजे ।
ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद्गात्रे यान्ति सौम्यताम् ॥ ३३॥

Tasya Gehe Vasellakshmirvani Cha Vadanambuje |
Brahmastradini Shastrani Tadgatre Yanti Saumyatam || 33||

 

इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छिन्नमस्तकाम् ।
सोऽपि शत्रप्रहारेण मृत्युमाप्नोति सत्वरम् ॥ ३४॥

Idam Kavachamaj~Natva Yo Bhajechchinnamastakam |
So.Api Shatrapraharena Mr^Ityumapnoti Satvaram || 34||

 

॥ इति श्रीभैरवतन्त्रे भैरवभैरवीसंवादे
त्रैलोक्यविजयं नाम छिन्नमस्ताकवचं सम्पूर्णम् ॥


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Published on May 4th, 2020


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